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Janm Janmantar
Title Janm Janmantar
Author Shri Arun Kumar Sharma
Shri Manoj Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2017
Price Rs. 250.00 (free shipping within india)
ISBN 9789384172039
Binding Type Paper Bound
Pages vi + 250 Pages
Size 21.5 cm x 14.5 cm
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जन्म-जन्मान्तर पुस्तक, जगत के अनन्त प्रवाह में बहती एक ऐसी युवती की मार्मिक कथा है, जो संसार में बार-बार जन्म लेती है अपने अधूरे वचन को पूर्ण करने के लिये। वह हर जन्म में छली जाती है कभी समाज के रुढिवादी बन्धनों से, कभी परिस्थितिवश, कभी अपनों के द्वारा।

बौद्धकाल से लेकर 21 वीं सदी तक उसका सात बार जन्म होता है। क्या वह अपने वचन को पूरा कर पाती है या फिर काल के प्रवाह में विलीन हो जाती है ? परिस्थितिजन्य दो प्रेमी अनजाने में जन्म-जन्मान्तर तक साथ निभाने का वचन देते हैं। अपने वचन को पूर्ण करने के लिये उन्हें संसार में बार-बार जन्म लेकर असीम कष्टों का सामना करना पड़ता है। क्षेमा, भुवनमोहिनी, अपराजिता, मणिपद्मा, विविधा, दीपशिखा और वर्तमान मे सोनालिका तक सभी कथायें अत्यन्त मार्मिक हैं और भारत के बदलते समय को दर्शाती हैं।

छुट्टियाँ बिताकर नर्मदा के तट पर मित्रों के साथ फोटो लेती हुई सोनालिका का पैर फ़िसल जाता है और वह नर्मदा की प्रबल धारा में बह जाती है। होश आने पर खुद को घने जंगल के बीच एक झोंपड़ी में पाती है। यहीं से उसके जीवन में एक ऐसी घटना घटती है, जिसके कारण उसके जीवन की धारा ही बदल जाती है।
Kaalanjayi
Title Kaalanjayi
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2015
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9789384172022
Binding Type Paper Bound
Pages vi + 250 Pages
Size 21.5 cm x 14.5 cm
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एकाएक बाबा कालूराम रुक गये और पलटकर गंगा की धारा की ओर देखकर बोले - कीनाराम देख कोई शव बहा जा रहा है। कीनाराम तत्काल बोले नहीं बाबा वह जिन्दा है। तो बुला उसे। कीनाराम वहीं से चिल्लाकर बोले - इधर आ, कहाँ बहता जा रहा है? तत्काल वह शव विपरीत दिशा में घूमा और घाट किनारे आ लगा। फ़िर धीरे-धीरे उठा और पूरी शक्ति बटोर कर मूकवत् खड़ा हो गया हाथ जोड़कर। कीनाराम बोले- खड़ा-खड़ा मेरा मुँह क्या देख रहा है, जा अपने घर तेरी माँ रो-रो कर पागल हो रही है। तत्काल वह दौड़ता हुआ घर की ओर भागा और अपनी माँ को जीवित होने की कथा सुना डाली। उसकी माँ को विश्वास नहीं हो रहा था वह उसी हाल में अपने बेटे को लेकर घाट कि ओर भागी। तब तक सभी लोग घाट की सीढी चढकर सड़क पर आ चुके थे। तभी कीनाराम की नज़र सामने पड़ी देखा कि वह बालक अपनी माँ के साथ भागता हुआ चला आ रहा है। कीनाराम कुछ समझते उससे पहले ही बालक की माँ आकर कीनाराम के पैरों पर गिर् पड़ी। कीनाराम ने उसे उठाया और आने का कारण पूछा। वह बोली- बाबा आपकी कृपा से मेरा पुत्र पुनः जीवित हो गयाअ इसके लिये मैं सदा आपकी ऋणी रहूँगी। लेकिन आपने इसे जीवन दान दिया है अब यह आपका है। मेरी दी हुइ जिन्दगी तो खत्म हो चुकी थी। बाबा इसे आप अपने चरणों में स्थान दीजिये। इसे मैं आपको सौंपती हूँ। कीनाराम ने बाबा कालूराम की ओर प्रश्न भरी नज़रों से देखा। बाबा कुछ बोले नहीं बस सिर हिलाकर अपनी सहमति दे दी। आगे चलकर बाबा ने उस बालक का नाम रामजियावन रखा जो आगे चलकर एक बड़े सिद्ध अघोरी बने।

Kaal Paatra
Title Kaal Paatra
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2014
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9789384172008
Binding Type Hard Bound
Pages x + 72 + 326 Pages
Size 22.5 cm x 14.5 cm
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प्राण ऊर्जा का निस्तारण और ग्रहण श्वांस के माध्यम से ही होता है और चरम एकाग्रता द्वारा उस सूक्ष्म ऊर्जा के प्रवाह को महसूस किया जा सकता है। जब तक मन शान्त नहीं होगा चित्त शान्त नहीं होगा। वैसे तो शरीर, जीने के लिये श्वांस द्वारा प्राण ऊर्जा नैसर्गिक लेता रहता है लेकिन विशेष क्रिया द्वारा इसकी ग्रहण व प्रक्षेपण शक्ति असीम हो जाती है। श्वांस लेने कि क्रिया जितनी मन्द होगी छोड़ने की क्रिया उससे भी मन्द होनी चाहिये। श्वांस का लय ही इस क्रिया की मूल कुंजी है।


सर्वप्रथम बौद्ध लामा ने श्वांस-प्रश्वांस को लयबद्ध करने का अभ्यास कराया। इसके दौरान ही मैं असीम शान्ति का अनुभव करने लगा था। उन्होंने कहा - आगे इसी तरह अभ्यास करते रहना। कोई समय सीमा नहीं है इस अभ्यास में। जब श्वांस-प्रश्वांस लयबद्ध हो जायेगी इसका तुम स्वयं अनुभव करने लगोगे लामा बोले। मुझे तो प्रथम बार में ही सम्पूर्ण शरीर में ऊर्जा का विशेष अनुभव हो रहा था। बौद्ध गुम्फा (मन्दिर) के दाहिने ओर एक वट वृक्ष की ओर इशारा करते हुए लामा बोले उस वृक्ष को देख रहे हो। मैंने कहा हाँ। आओ वृक्ष के पास चलें। मैंने उनका अनुशरण किया। उस वट वृक्ष के चारों ओर तख्त लगे हुए थे। लामा ने इशारे से कहा कि उस तख्त पर चढ जाओ। मैंने वैसा ही किया। फिर लामा बोले - लम्बी श्वांस लो और धीरे-धीरे छोड़ो। अपने दोनों हाथों को फैलाकर वृक्ष को पकड़ो हथेली खुली रहे और मन को एकाग्र करो। वृक्ष और हथेली के बीच कुछ दूरी बनी रहे। क्योंकि अगर वृक्ष का स्पर्श करोगे तो उसके स्पर्श का अनुभव होगा उसकी ऊर्जा का नहीं। इसलिये एक इंच की दूरी आवश्यक है। उन्होंने आगे बतलाया कि अपनी लम्बी श्वांस खींच कर ध्यान लगाओ। उस श्वांस के माध्यम से ऊर्जा दाहिनी हथेली के द्वारा वृक्ष में समाहित हो रही है और बायीं हथेली के माध्यम से पूरे शरीर में शनै-शनै प्रवेश कर रही है। एक वर्तुल बनेगा। कम से कम पाँच बार इस क्रिया को दोहराओ। फिर उसी प्रकार बायीं हथेली से अपनी ऊर्जा प्रवाहित करो। फिर पाँच बार वर्तुल बनाओ, ध्यान रखना श्वांस पर पूरा नियन्त्रण रहे।

Tantram
Title Tantram
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2013
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679657
Binding Type Hard Bound
Pages xiv + 86+ 368 Page
Size 22 cm x 14 cm
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चारों तरफ हरियाली, सिन्दूरी आभा लिये प्रकाश्, गेरुवे रंग के मठ-मन्दिर लेकिन सभी अपने आप में मग्न। कहीं कोई ध्वनि नहीं। नीरव वातावरण। कहीं कोई ध्यान कर रहा था तो कुछ लोग जप कर रहे थे तो एक स्थान में बहुत से युवा सन्यासी हवन कृत्य में संलग्न थे। तभी मैंने देखा कि एक तेजस्वी, सन्यासी के समीप पत्थर की शिला पर बैठा है। उस पर मृग चर्म बिछा था। पद्मासन की मुद्रा में, गैरिक वस्त्र और रुद्राक्ष की माला पहने वे तेजस्वी ध्यानस्थ बैठे थे। उनके चेहरे से अपूर्व आभा निकल रही थी। चन्दन की सुगन्ध से पूरा वातावरण दिव्य लग रहा था।

मैं बोलना चाहा पर बोल नहीं पाया। लेकिन मेरी मस्तिष्क ऊर्जा बहुत तेज हो गई थी। ऐसा लगता था कि मेरी वाणी रुक गई हो। तभी विचार के माध्यम से वार्ता करने की प्रेरणा मिल रही थी अगोचर रूप से। तभी ध्यानस्थ सन्यासी की आवाज मेरे मानसपटल में गूँजने लगी। देखा तो वे ध्यानस्थ थे लेकिन उनकी वाणी कहें या विचार सम्प्रेषण मुझे साफ-साफ अनुभूत हो रही थी। वे कह रहे थे कि मैं इस समय वैश्वानर जगत में हूँ। दिव्यैश्वरी के अनुरोध पर तुम्हे मिलने की आज्ञा दी। अगर न मिलता तो यह एक संकल्प बन जाता। फ़िर कहीं न कहीं तुमसे मिलने का प्रयोजन बनता। इच्छा हो चाहे संकल्प हो वह बन्धन का कारण बनता है। इसलिये इच्छा या संकल्प का कम से कम होना साधकों के लिये आवश्यक है। दिव्यैश्वरी ने भी ऐसा ही किया था। जगत में जितना मानव निरपेक्ष और तटस्थ रहेगा उतना ही बन्धन मुक्त होगा। इस जगत में लोग बातें करते हैं केवल विचारों के माध्यम से। जिस जगत मे तुम रहते हो वहाँ विचार शब्दों के माध्यम से वाणी द्वारा प्रकट होते हैं यहाँ ऐसा नहीं है।

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प्रज्ञाचक्षु बोले - अरे हाँ! एक बात तो बतलाना भूल ही गया था । वह यह कि प्राणतोषिणि क्रिया की तरह ही एक यौगिक क्रिया है 'नाड़ी बन्ध' । जिस समय वह रहस्यमयी यौगिक क्रिया सम्पन्न होती है उसी समय शरीर जिस अवस्था में रहता है - स्थिर हो जाता है। शरीर पर, मन पर, प्राण पर, काल का, समय का और आयु का प्रभाव नहीं पड़ता । शरीर जिस अवस्था में रहता है उसे अवस्था में सैंकड़ों वर्ष तक रहता है । महात्मा ने बतलाया कि पिछले तीन सौ वर्षों से वे वर्तमान शरीर में ही है । नाड़ी बन्ध के समय जैसा था वैसा ही आज भी है और अभी दो सौ वर्ष पर्यन्त ऐसा ही रहेगा । क्या आपका शरीर कभी अस्वस्थ नहीं हुआ ? नहीं ! हो ही नहीं सकता । शरीर अस्वस्थ होता है प्राण के कारण । प्राण में व्यतिक्रम उत्पन्न होने पर ही रोग व्याधि उत्पन्न होती है और जब प्राण पर काल का प्रभाव पड़ना बन्द हो जाता है तो फिर प्रश्न ही नहीं उठता अस्वस्थ होने का ।

शरीर की आवश्यकता 'अन्न' यानि भोजन है । अन्न तत्व से रक्त और और रक्त तत्व से 'वीर्य' और 'वीर्य' से शरीर का निर्माण होता है । इसलिये अन्न प्रधान है । एक सांसारिक व्यक्ति के भोजन से एक योगी का भोजन अनेक अंकों में भिन्न होता है । शरीर की अपनी माँग है । क्योंकि शरीर प्रकृति के नियमों के आधीन होता है । आप शरीर की कैसे करते हैं पूर्ति ? इच्छा शक्ति से । साधारण व्यक्ति के पास इच्छा तो है लेकिन शक्ति नहीं । एक इच्छा की पूर्ति के लिये उसे विभिन्न प्रकार के कर्म करने पड़ते हैं तब कहीं जाकर इच्छा पूर्ण होती है । योगी के पास इच्छा के साथ-साथ शक्ति भी है और वह शक्ति है अवचेतन मन की शक्ति ।

तुम चार दिन से भूखे प्यासे हो । इस आवश्यकता को कैसे पूर्ण करोगे ? कर्मों के द्वारा ही न, भोजन की सामग्री लाओगे फिर भोजन बनाओगे फिर उसे खाओगे । इस गुफा में सभी वस्तुओं का अभाव है । न भोजन की सामग्री है न ही भोजन बनाने का साधन । फिर कैसे क्या होगा ? अब देखो मेरे इच्छा शक्ति । इतना कह कर महात्मा ने मुझे नेत्र बन्द करने का आदेश दिया और जब मैंने कुछ क्षणों के बाद अपनी आँखें खोली तो आश्चर्यचकित रह गया मैं । मेरे सामने थाली में मेरे रुचि का भोजन रखा था । बाद में तो नित्य मनोनुकूल भोजन मिलने लगा मुझे । जो कुछ मैं चाहता उसकी पूर्ति महात्मा कर देते थे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर । पूरे दो मास रहा मैं उस हिम गुफा में । इस अवधि में प्रज्ञाचक्षु से जो ज्ञानार्जन मैंने किया वह निःसन्देह महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सम्पत्ति समझी जायेगी ।

Awahan
Title Awaahan
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2010
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679640
Binding Type Hard Bound
Pages xxxiv + 462 Page
Size 22.5 cm x 14.5 cm
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महात्मा ने ध्यान से मेरी ओर देखा और फिर एकबारगी चौंक कर बोले - तुम... तुम... पूर्णानन्द सरस्वती हो न? यह सुनकर आश्चर्य हुआ मुझे! सोचा भ्रम हो गया है महात्मा को। बोला - नहीं महाशय, मैं पूर्णानन्द सरस्वती नहीं हूँ। आपको समझने में गलती हुई है। नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। मुझसे आपको पहचानने में भूल नहीं हो सकती। पूरे दस वर्षों से इधर-उधर भटक रहा हूँ पूर्णानन्द् तुम्हारी खोज में। चलो, उठो, आश्रम में चलो। महात्मा की बातें सुन कर किंकर्तव्यविमूढ सा हो गया था मैं उस समय। कैसे समझाऊँ उस मतिभ्रष्ट और भ्रमित महात्मा को कि मेरा नाम अरुण कुमार शर्मा है। काशी में रहता हूँ। मेरा अपना परिवार..। मैं कुछ कहूँ उसके पहले ही उस विक्षिप्त महात्मा ने मेरा हाथ थाम कर उठाते हुए कहा - ज़रा अपनी ओर तो देखो, तब सब समझ में आ जायेगा।

उसी क्षण मैंने अपनी ओर देखा। आश्चर्यचकित रह गया मैं। न जाने मेरा स्वरूप और वेशभूषा आदि सब कुछ सन्यासी जैसा हो गया था। यह कैसा परिवर्तन? मुण्डित सिर, शरीर पर रेशमी कषाय वस्त्र, बगल में रुद्राक्ष और स्फटिक की मालाएँ, मस्तक पर त्रिपुण्ड की गहरी रेखाएँ, बगल में कमण्डल और मृगचर्म। हे भगवान्! कैसे हो गया ये सब? कैसे बन गया एक युवा ब्राह्मण पुत्र सन्यासी? अपने आपको देख रहा था मैं बार-बार। विश्वास नहीं हो रहा था मुझे एकाएक हुए इस अविश्वसनीय और विलक्षण परिवर्तन को देखकर।



Akashcharini
Title Akashcharini
(The Flying Priestess)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2007
Price Rs. 225.00 (free shipping within india)
ISBN 9AGAH
Binding Type Hard Bound
Pages x + 278 Pages
Size 22.5 cm x 14.5 cm
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सावन-भादों का महीना था। बादलों से अटकर काला पड़ गया था आकाश। गहन निःश्वास सी पुरुवा हवा हा-हाकार करती हुई किले में दानव की तरह खड़े पेड़ों और फैली हुई झाड़ियों को कँपा दे रही थी। घोर निस्तब्ध रात्रि। निबिड़ रात्रि का गहन अन्धकार। यदा-कदा अभिशप्त किले में निवास करने वाली प्रेतात्माओं की एक साथ हँसने और रोने की भयानक तीखी आवाजों से किले का निस्तब्ध वातावरण बार-बार काँप उठता था और उसी के साथ मेरा मन भी दहशत से भर जाता था। सहसा मेरी दृष्टि स्याह आकाश की ओर उठ गयी। क्यों उठ गयी थी? नहीं जानता। मगर दृष्टि उठते ही आकाश के श्याम पटल पर बादलों के बीच मैंने जो कुछ देखा उसने मुझे एकबारगी रोमान्चित कर दिया।

गहरे अन्धकार में डूबे हुए मेघाच्छन्न आकाश में मैंने देखा एक सुन्दर स्त्री तीव्र गति से उड़ती हुई पूरब से उत्तर दिशा की ओर चली जा रही थी। उसके काले बाल बिखर कर हवा में लहरा रहे थे। उस स्त्री की गति कभी तीव्र हो जाती तो कभी मन्द। सबसे आश्चर्य की बात थी कि मैं उस घोर अन्धकार में भी स्पष्ट देख रहा था उस आकाशचारिणी योगिनी को। निश्चय ही वह कोई उच्चकोटि की योगसाधिका थी। देखते ही देखते वह निविड़ अन्धकार के आगोश में समा गयी।



Teesara Netra - 1
Title Teesara Netra - Part 1
(The Third Eye - Part 1)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Re-print - 2008
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679619
Binding Type Hard Bound
Pages xx + 340 Pages
Size 22.5 cm x 14.0 cm
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लामावर्तन योग, तन्त्र, मन्त्र, ज्योतिष और आयुर्वेद के निष्णात विद्वान तो थे ही इसके अतिरिक्त आध्यात्म शास्त्र पर भी पूर्ण अधिकार था उनका इसमें सन्देह नहीं।

एक दिन प्रसंगवश मठ के गुप्त प्रकोष्ठ की चर्चा करते हुए उसे देखने की इच्छा प्रकट की मैंने उनसे। पहले तो उन्होंने यह कहकर टालने का प्रयत्न किया कि बाहरी व्यक्ति को उस प्रकोष्ठ में प्रवेश की आज्ञा नहीं है। लेकिन मेरे बार-बार अनुरोध करने पर अन्ततः दिखाने के लिये तैयार हो गये। तलघर जैसा था वह गुप्त प्रकोष्ठ। नीचे जाने के लिये पत्थर की सीढीयाँ थी धूल से अटी पड़ी। लगा जैसे वर्षों से कोई वहाँ आया गया न हो। पूरी तरह अन्धकार मे डूबा हुआ था सारा प्रकोष्ठ। प्रकाश की व्यवस्था हुई। अपने पीछे आने का संकेत कर धीरे-धीरे सीढीयाँ उतरने लगे लामावर्तन। मैंने भी उनका अनुशरण किया। सीढीयाँ उतरने के बाद एक काफी लम्बा-चौड़ा हालनुमा कमरा मिला मुझे। जिसके मध्य में पत्थर की कई ऊँची-ऊँची वेदियाँ बनी हुई थी। जिनमें कुछ को छोड़कर अन्य सभी पर एक-एक लामा योगी पद्मासन की मुद्रा में समाधिस्थ बैठे हुए थे। जिनके शरीर पर मांस नाम मात्र का नहीं था। सभी हड्डियों के ढाँचे मात्र थे। सारा शरीर सनसना उठा मेरा एकबारगी। लगा जैसे किसी कब्र में आ गया हूँ मैं। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उस प्रकोष्ठ के रहस्यमय वातावरण में एक विचित्र प्रकार की सुगन्ध बिखरी हुई थी जो मन ओर प्राण को सम्मोहित सी कर रही थी।

ध्यानपूर्वक देख रहा था मैं उन अस्थिमय लामा योगियों को, तभी लामावर्तन का गम्भीर स्वर सुनाई पड़ा मुझे। ये सभी योगी मृतसमाधि में लीन हैं सम्भवतः दो ढाई सौ वर्षों से।

चौंक पड़ा मैं। सिर घुमाकर आश्चर्य से लामावर्तन की ओर देखा।

लामावर्तन आगे बोले -- आप जिन-जिन योगियों को यहाँ मृत समाधि की अवस्था में देख रहे हैं वे अपने आत्मशरीर द्वारा पिछले दो सौ पचास वर्षों से ब्रह्माण्ड भ्रमण कर रहे हैं। जिनका एकमात्र उद्देश्य है - जिस सीमा तक उप्लब्ध हो सके उस सीमा तक ब्रह्माण्ड के रहस्यों से परिचित होना, लोक-लोकान्तरों का ज्ञान प्राप्त करना और उन दोनों के आश्रय से आध्यात्मिक उन्नति करना। उनका उद्देश्य जब पूरा हो जायेगा और भ्रमण की अवधि भी पूरी हो जायेगी तो पुनः अपने-अपने पार्थिव शरीर में वे वापस लौटकर जीवित हो उठेंगे।



Teesara Netra - 2
Title Teesara Netra - Part 2
(The Third Eye - Part 2)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Third Edition - 2008
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679626
Binding Type Hard Bound
Pages xvi + 32 + 464 Pages
Size 22.5 cm x 14.0 cm
  buying instruction
ऐसा ही किया कमलेश्वर ने। आँखें बन्द करके लामा की गोद में बैठ गये एक बालक की तरह। उसके बाद फिर उन्हें किसी प्रकार का बाह्य ज्ञान नहीं रहा। लगभग एक घण्टे बाद कमलेश्वर को आँखें खोलने का आदेश मिला और जब उन्होंने आँखें खोली तो आश्चर्यचकित रह गये। वे तिब्बत के किसी अति दुर्गम प्रदेश में थे। सिर घुमाकर चारों ओर देखा लेकिन उनके लामा गुरु जिनके साथ वे आकाशमार्ग से आये थे - कहीं नजर नहीं आये। कमलेश्वर को घोर आश्चर्य हुआ। उस हिमप्रान्त में अकेले थे वह। झिर-झिर कर बर्फ के कण आकाश से गिर रहे थे उस समय। चारों तरफ घोर निस्तब्धता छायी हुई थी वातावरण में। न जाने क्या सोचकर धीरे-धीरे एक ओर बढने लगे कमलेश्वर।

काफी देर चलने के बाद कमलेश्वर को एक गुफा दिखाई दी। गुफा का द्वार तो छोटा था लेकिन एक व्यक्ति आसानी से प्रवेश कर सकता था उसमें। वे गुफा के सामने खड़े होकर सोचने लगे कि गुफा के भीतर प्रवेश करें या न करें और तभी अचानक एक बर्फीला तूफ़ान आया और उड़ा ले गया कमलेश्वर को। बेहोश हो गये वह और जब होश आया तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि उनका शरीर बर्फ़ से ढका हुआ है और वे उसे देख रहे हैं। उनको आश्चर्य और कौतूहल इस बात का था कि वे अपने शरीर से अलग कैसे हैं? क्या वे तूफ़ान में फँसकर मर चुके हैं। हाँ! मर चुके थे वो। शरीर से उनका अब कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था। लेकिन उनके अपने आपमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। वे जैसे जीवित अवस्था में थे वैसे ही मृत अवस्था में भी। लकिन हल्कापन अधिक अनुभव कर रहे थे कमलेश्वर। एकाएक उन्हें उस गुफा की याद आयी। थोड़ी ही देरे बाद पहुँच गये वह गुफा के सामने और किसी अज्ञात प्रेरणा के वशीभूत होकर उसके भीतर चले गये। कुछ ही दूर जाने पर एक पत्थर की वेदी पर पद्मासन की मुद्रा में नेत्र बन्द किये एक महात्मा को देखा बैठे हुए।

उस महात्मा को देखकर उनको घोर आश्चर्य हुआ, इस बात का कि वह महात्मा कोई और नहीं स्वयं वे ही थे-- पाषाण की वेदी पर बैठे पद्मासन की मुद्रा में, एक सौ अस्सी वर्ष पूर्व उसी काया का त्याग किया था उन्होंने और तब से अविचल बैठी हुई थी उनकी वह काया मृतवत।

अपनी पूर्व मृतकाया को देखकर कमलेश्वर की आत्मा विह्वल हो उठी एकबारगी और प्रबल आकर्षण के वशीभूत होकर उस मृतकाया में प्रविष्ट हो गये और उसी के साथ वह मृतकाया पुनःजीवित हो उठी। जिसके भीतर थी कमलेश्वर की नहीं बल्कि एक महान योगी की आत्मा जिसका एक सौ अस्सी वर्ष पूर्व गुरु प्रदत्त नाम था चैतन्यप्रज्ञ।



Rahasya
Title Rahasya
(The Mysticism)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2008
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679602
Binding Type Hard Bound
Pages xx + 452 Pages
Size 22.5 cm x 14.5 cm
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गायत्री दो लोटा भर कर पानी ले आयी। एक लोटा बड़ा था और दूसरा छोटा। बड़े लोटे का पानी लेकर रामगोपाल ने कोई मन्त्र बुदबुदाया। फिर छोटे लोटे का पानी लेकर उसी तरह कोई मन्त्र पढा। फिर बड़े लोटे का पानी गायत्री को देते हुए उसने कहा- इस लोटे का पानी मुझ पर डालते ही मैं शेर बन जाऊँगा और जब तुम छोटे लोटे का पानी मेरे ऊपर डालोगी तो मैं वापस मनुष्य बन जाऊँगा। लेकिन खूब होशियार रहना। ज़रा सी भी भूल मत करना।

फिर क्या हुआ? मैंने प्रश्न किया।

होगा क्या? शास्त्री जी ने कहा - जो होना था वही हुआ। गायत्री ने बड़े लोटे का पानी, आधी रात की निस्तब्धता में रामगोपाल के ऊपर डाल दिया और फिर देखते ही देखते कमरे के भीतर एक विशालकाय भयंकर शेर अवतरित हो गया। उसने अपनी अंगारे की तरह जलती हुई आँखों से गायत्री की ओर देखा ओर फिर अपनी जीभ लपलपाते हुए रह-रहकर गुर्राने लगा ओर साथ ही चक्कर काटने लगा कमरे में।

अपने सामने एक भयानक शेर को देखकर गायत्री थर-थर काँपने लगी ओर चीखकर बेहोश हो गयी। उसके बाद सर्वनाश ही हो गया। गायत्री की चीख सुनकर उसके आठ साल के बेटे श्यामू की नींद टूट गयी। बिछौने पर उठ बैठा। भयंकर शेर को सामने देखकर वह डरकर भागा। और इसी भाग दौड़ में दूसरे लोटे में रखा पानी जमीन पर गिरकर फैल गया। पानी को गिरते देखकर शेर की आँखें जल उठी, क्रोध से नहीं, भय ओर पश्चात्ताप से। दोबारा मनुष्य बनने का रास्ता बन्द् हो चुका था अब उसके लिये। रामगोपाल शेर के रूप में जोर से दहाड़ा।



Parlok Vigyan
Title Parlok Vigyan
(The Secrets of the Next World)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2006
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 8OTPVH
Binding Type Hard Bound
Pages xxxii + 374 Pages
Size 21.5 cm x 14.0 cm
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बात उन दिनों की है जब मैं बी0 ए0 का छात्र था। मेरा एक सहपाठी था। नाम था पुरुषोत्तम अम्बालाल पटेल। खम्बात का रहने वाला था पटेल। हम दोनों में गहरी मित्रता थी। एक बार बातचीत के दौरान अचानक बोल बैठा पटेल - भाई शर्मा जी हम दोनों में जो पहले मरेगा वह परलोक की बात बतलाएगा दूसरे को। मैंने हँसकर कहा, तुम पागल हो। अभी तक किसी ने मरने के बाद बतलाया है आकर परलोक की बात। मगर मैं बतलाऊँगा देखना - पटेल का स्वर गम्भीर था। भला मैं उस समय कहाँ जानता था कि पटेल जो कह रहा है वह कभी कर के भी दिखाएगा।

परीक्षाफल निकलने के बाद पटेल अपने घर चला गया। कुछ समय तक हम दोनों में पत्र व्यवहार होता रहा। फिर धीरे-धीरे बन्द हो गया। बाद में पता चला कि फौज में भर्ती हो गया है पटेल। दूसरे महायुद्ध का अन्तिम चरण था। उस समय अचानक पता चला कि पटेल युद्ध में मारा गया। यह समाचार सुनकर स्तब्ध रह गया मैं। धीरे-धीरे चार साल का लम्बा अर्सा गुज़र गया। और उसी के साथ सब कुछ भूल गया मैं।

उस दिन सुबह से ही झम-झम कर बरस रहे थे मेघ, साँझ का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा विद्यालय की परीक्षा की कापी जाँच रहा था। तभी फटाक् से बन्द दरवाजा खुला। सिर उठा कर देखा। सामने पटेल खड़ा मुस्कुरा रहा था। पूरे फौजी वर्दी में था वह। उसे देखते ही सन्न रहा गया मैं। सारा शरीर रोमान्चित हो उठा मेरा। सुषुम्ना शिथिल होती जान पड़ी। खून बर्फ़ हो जाए, ऐसा ठण्डा आतंक मेरी शिराओं में दौड़ गया। किसी प्रकार गला साफ कर हकलाते हुए बोला- अरे पटेल तुम?



Maaran Paatra
Title Maaran Paatra
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Third Edition - 2008
Price Rs. 450.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679633
Binding Type Hard Bound
Pages xvi + 60 + 572 Pages
Size 22.0 cm x 14.0 cm
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मैंने कहा - सुना है कि योगीगण अपने सामर्थ्य बल से किसी को भी अपनी सिद्धि का अनुभव करा सकते हैं। क्या यह संभव है?

मातुलीमाया बोली - हाँ, यह संभव है।

तो क्या आप मुझे भी बिना धड़कन के जीवन का अनुभव करा सकेंगी?

क्यों नहीं। लेकिन इसके लिये आपको भी थोड़ा प्रयास करना होगा। आप पहले खूब जोर-जोर से श्वास खींचें और बाहर निकालें। फिर उसी क्रिया के समय अपने भ्रूमध्य में मन को एकाग्र करें।

मैंने वैसा ही किया। भ्रूमध्य पर मन को ले जाते ही चित्त अपने आप एकाग्र हो गया और उसी समय मातुलीमाया की उँगली को अपनी नाभि में धँसने का अनुभव किया मैंने। थोड़ी देर बाद मुझे लगा जैसे मेरे हृदय की धड़कन रुक गयी है और श्वास-प्रश्वास की गति भी। मैं पूर्ण रूप से जीवित था। पूरी तरह होश में था और पूरी तरह चैतन्य भी। मगर विश्वास करें मेरे हृदय की धड़कन बिल्कुल बन्द थी और श्वास-प्रश्वास की गति भी। मेरा सारा शरीर हल्का और प्रफुल्ल हो गया था। मस्तिष्क में भी एक विचित्र सी शीतलता छा गयी थी। अगर मैं उस अवस्था में सो जाता तो लोग मुझे निश्चित ही मृत समझते।

मातुलीमाया ने कहा - आप यहाँ जब तक रहेंगे इसी स्थिति में रहेंगे। आप पर देश्-काल का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इन्द्रियों को किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मातुलीमाया का कहना बिल्कुल ठीक था। मैं जब तक उस पातालपुरी में था तब तक मुझे न भूख लगी और न प्यास लगी और न ही किसी प्रकार की आवश्यकता ही महसूस हुई। लेकिन जब एक दिन रहस्यमय ढंग से बाहर निकला तो आश्चर्य से भर गया मेरा मन। पूरे छः महीने रहा मैं उस रहस्यमय आश्रम में। मगर उन छः महीनों में न मेरे नाखून बढे थे, न बाल बढे थे और न तो मेरे कपड़े ही मैले हुए थे। लेकिन बाहर निकलते ही भूख-प्यास से व्याकुल हो उठा मैं। शरीर और कपड़े बहुत गन्दे हो गये थे। नाखून और बाल भी बड़े हो गये थे। छः महीने तक लापता रहने के कारण किसी ने सोचा की मैं मर गया कहीं बाहर जाकर। किसी ने समझा कि मैं साधु होकर कहीं चला गया।

सभी लोगों ने पूछा - कहाँ था अब तक मैं? क्या करता था? मेरी ऐसी हालत कैसे हो गयी?

क्या उत्तर देता मैं। अगर सही बात बतलाता तो कौन करता मेरी बातों पर विश्वास।



Abhautik Satta Me Pravesh
Title Abhautik Satta Me Pravesh
(Entering into Metaphysical Existence)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Second Edition - 2006
Price Rs. 250.00 (free shipping within india)
ISBN 9AGASMPH
Binding Type Hard Bound
Pages xiv + 296 Pages
Size 22.5 cm x 14.0 cm
  buying instruction
रात्रि अधिक व्यतीत हो चुकी थी। दिव्यकैवल्य फिर रुके नहीं, चले गये, लेकिन जाते समय मेरे आग्रह पर प्राणचक्र पर मन को कैसे स्थिर और एकाग्र किया जाता है यह बतला गये। उसी समय से शुरु कर दी मैंने प्राणचक्र पर मन को एकाग्र करने की क्रिया। फिर लगातार चली वह क्रिया। दिन में दैनिक कार्य करता और रात्रि में केवल साधना। पूरा एक महीना निकल गया लेकिन लाभ कुछ नहीं हुआ। किसी प्रकार की सफलता नहीं मिली। लेकिन हताश, निराश नहीं हुआ। एक दिन अचानक पेट में भयंकर दर्द होने लगा। तकलीफ़ बढती गयी। दवा ली लेकिन कोई लाभ नहीं। कभी-कभी ऐसा लगता था कि पेट में एक विशेष स्थान पर सुई जैसा कुछ चुभ स रहा है। मेरी साधना का समय हो रहा था लेकिन कष्ट के कारण मन स्थिर और एकाग्र नहीं हो पा रहा था। क्या करूँ समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन उसी दारुण स्थिति में किसी प्रकार प्राणचक्र पर मेरा मन स्थिर हो गया और फिर तो सब कुछ भूल गया मैं। बड़ी शान्ति का अनुभव हो रहा था उस समय।

उसी परम शान्ति की अवस्था में मैंने देखा कि मैं अपने स्थूल शरीर से अलग हो गया हूँ। मैंने अपने दोनों शरीरों को एक साथ देखा निरपेक्ष भाव से। दोनों शरीरों में किसी प्रकार का वैषम्य नहीं था। यदि वैषम्य था तो केवल इतना कि स्थूल शरीर गौरवर्ण का था और सूक्ष्म शरीर था उज्ज्वल वर्ण का। मैं पद्मासन की मुद्रा में बैठा हुआ था और मेरे ठीक सामने मेरा उज्ज्वल वर्ण सूक्ष्म शरीर भी पद्मासन की मुद्रा में बैठा था। वह पारदर्शी था लेकिन सब कुछ स्पष्ट था।

उस दिन से नित्य मेरा सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से अपने आप अलग होने लग गया। मुझे इसके लिये कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। बस प्राणचक्र पर मन को एकाग्र करता और सूक्ष्म शरीर अलग हो जाता मेरी स्थूलकाया से। उस समय बड़ा ही सुखद अनुभव होता मुझे। कभी-कभी आनन्दमग्न हो जाता मैं। कब कितना समय व्यतीत हो जाता इसका ज्ञान न रहता मुझे।



Maranottar Jeevan Ka Rahasya
Title Maranottar Jeevan Ka Rahasya
(Secrets of Life After Death)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Second Edition - 2007
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9AGMJKRH
Binding Type Hard Bound
Pages xiv + 53 + 384 Pages
Size 22.5 cm x 14.0 cm
  buying instruction
मृत्यु के 'क्षण' केवल 'आत्मा' का बहिर्गमन होता है। उसके पूर्व एक-एक करके पाँच प्रकार के प्राण बाहर निकलकर उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर की रचना करते हैं, जिस प्रकार गर्भ में स्थूल शरीर का निर्माण क्रम से होता है। प्राणों की सहायता से सूक्ष्म शरीर की रचना पूर्ण होते ही अपने मूल वाहक धनन्जय प्राण के द्वारा 'आत्मा' बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है। यह शरीर के जिस अंग से निकलती है, उसे खोलती, तोड़ती हुई जाती है। जो भयंकर पापी हैं उनकी आत्मा मूत्र या मल के मार्ग से, मध्यम श्रेणी के लोगों की आत्मा मुख से, जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक हैं उनकी आत्मा नेत्रों से और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ, पुण्यात्मा अथवा योगी हैं उनकी आत्मा ब्रह्म रन्ध्र से निकलती है।

मृत्यु क्षण के पूर्व जिसके सूक्ष्म शरीर की रचना तुरन्त हुई रहती है उसे वासना शरीर यानि प्रेत शरीर धारण नहीं करना पड़ता। प्रेत योनि में भटकना नहीं पड़ता। मगर जिसके सूक्ष्म शरीर की रचना तुरन्त नहीं हुई रहती उसे सूक्ष्म शरीर की रचना होने तक प्रेत योनि मे रहना पड़ता है यानि वासना शरीर में।

प्रेत उस चेतना को कहते हैं जिसका शरीर तो छूट गया है लेकिन 'मन' नहीं छूटा। 'मन' सभी प्रकार की वासनाओं का भण्डार है और वे वासनाएँ शरीर के द्वारा ही तृप्त हो सकती हैं। किसी प्रिय का तन स्पर्श करना चाहता है लेकिन प्रेत स्पर्श नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास हाथ नहीं हैं, त्वचा नहीं है। मन स्वाद लेना चाहता है किसी स्वादिष्ट वस्तु का लेकिन प्रेत के पास जिह्वा नहीं है। मन देखना, सुनना चाहता है पर उसके पास आँख, कान नहीं हैं। प्रेत का यही कष्ट है कि उसके पास उपकरण नहीं है जिससे वह अपनी वासना को पूर्ण कर सके। वासना तो पूरी की पूरी है उसके पास, लेकिन साधन सब खो गये हैं। वासना अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। इसलिये प्रेतात्माएँ अच्छी भी होती हैं और बुरी भी।



Kundalini Shakti
Title Kundalini Shakti
(The Serpent Power)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Re-print - 2009
Price Rs. 425.00 (free shipping within india)
ISBN 9AGKSH
Binding Type Hard Bound
Pages xxviii + 592 Pages
Size 22.5 cm x 14.0 cm
  buying instruction
मठ के व्यवस्थापक थे महायोगी महातपा! उन्हीं के संचालन में सारा कार्य होता था। उन्हीं के आदेश पर नये प्रवेश करने वाले साधकों को योग-तन्त्र आदि की दीक्षा दी जाती थी। सर्वप्रथम मुझे उन्हीं के सम्मुख उपस्थित किया गया था। काफी लम्बा-चौड़ा कक्ष था। कक्ष की दीवारें सुनहले रंग की थी जिनमें से सुनहले रंग का प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा था। ओंकार की मन्द-मन्द ध्वनि भी गूँज रही थी वहाँ पर। वह ध्वनि कहाँ से निकल रही थी, यह मेरी समझ में नहीं आया। मगर यह निश्चित था कि वह किसी व्यक्ति के कण्ठ से नहीं फूट रही थी। उसका उद्गम कुछ और ही था, जो मेरे लिये अज्ञात था।

कक्ष के मध्य में रक्तवर्ण और पीतवर्ण के पारदर्शक स्फ़टिक पाषाण का शतदल कमल पुष्प था, जो स्वयं प्रकाशित हो रहा था। मैंने देखा - उस स्वप्रकाशित कमल पुष्प पर एक दिव्य महापुरुष पद्मासन की मुद्रा में विराजमान थे। वही थे महतपस्वी, महायोगी श्री महातपा। देखने में वे बिल्कुल एक बालक प्रतीत हो रहे थे। लेकिन उनकी आयु सबसे अधिक थी। उनका शरीर भी गुलाबी रँग का और पारदर्शक था। और था पूर्ण अनावृत। गले में मोतियों जैसी माला थी, जिसमें से शुभ्र वर्ण की रश्मियाँ निकल रही थी। वे बिना पलक झपकाये सामने की ओर स्थिर दृष्टि से देख रहे थे। तेजोमय मुखमण्डल पर किसी भी प्रकार का भाव नहीं था।

प्रज्ञा ने आगे कहा - उस दिव्य महात्मा के कक्ष में प्रवेश करते ही मेरी आत्मा को जिस आनन्द और जिस शान्ति का अनुभव हुआ उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती मैं। निश्चय ही उसी आनन्द और शान्ति को परम आनन्द और परम शान्ति कहते होंगे योगीगण।

उसी आनन्द और शान्ति के सागर में आकण्ठ डूबी हुई मैं जब उस दिव्य महापुरुष को निहार रही थी, उसी समय न जाने कब, कैसे और कहाँ से आकर मेरे गले में सुन्दर खिले हुए ताज़े गुलाब के फूलों की माला झूल गयी। घोर आश्चर्य हुआ मुझे। तीव्र सुगन्धमय गुलाब के फूल इतने बड़े-बड़े और सुन्दर थे कि उन्हें इस संसार का नहीं कहा जा सकता।

पुष्प की माला का प्राप्त होना इस बात का संकेत था कि मुझे दीक्षा की आज्ञा परम योगी महातपा से प्राप्त हो गयी है। उसके बाद मुझे दीक्षा कक्ष में ले जाया गया। वहाँ भी एक महायोगी पद्मासन में बैठे हुए दिखलायी पड़े मुझको। वे भी बालक सदृश थे। लेकिन उनकी आयु भी काफ़ी थी। उनके नेत्र बन्द थे। चेहरे पर असीम अलौकिक दिव्य तेज था। मुझे बतलाया गया कि उनका नाम कैवल्यपाद है और सैंकड़ों वर्षों से इसी प्रकार समाधिस्थ बैठे हुए हैं।

कैवल्यपाद का जहाँ आसन था, उसके समीप स्फ़टिक की एक गोलाकर वेदी थी जिस पर स्वर्ण का लगभग दो फुट ऊँचा दीपाधार था। उस दीपाधार पर अष्टधातु के पात्र में एक दीप प्रज्वलित था। पात्र में तेल के स्थान पर कोई अज्ञात तरल द्रव भरा हुआ था, जिसका रंग सोने की तरह था। दीप की ज्योति में किसी प्रकार का कम्पन नहीं था। सबसे आश्चर्य की बात थी कि उस स्थिर ज्योति का प्रकाश अत्यन्त तीव्र था और पूरे कक्ष में फैल रहा था। बाद में ज्ञात हुआ कि वह दीप पिछले कई सौ वर्षों से जल रहा है और निरन्तर प्रकाश बिखेर रहा है।



Kaaran Paatra
Title Kaaran Paatra
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: Second Edition - 2009
Price Rs. 250.00 (free shipping within india)
ISBN 9AGKPH
Binding Type Hard Bound
Pages x + 30 + 280 Pages
Size 22.5 cm x 14.5 cm
  buying instruction
योग की दृष्टि में नाभि बहुत ऊँचा स्थान् रखती है क्यों कि योग साधना का प्रारम्भ नाभि से ही होता है। योगीगण नाभि का विशेष ध्यान रखते हैं। यदि विचारपूर्वक देखा जाये तो योग साधना का प्रथम सोपान प्राणायाम है। योग के अनुसार नाभि प्राणों का संचयन स्थल है। यह मानव शरीर का संचालन बिन्दु है। उसी बिन्दु से प्राण ऊर्जा हृदय के माध्यम से मस्तिष्क को प्रेषित होती है। और मस्तिष्क, प्राण ऊर्जा को वायुवहा नाड़ियों के माध्यम से सारे शरीर में प्रवाहित करता है। इससे स्पष्ट है कि नाभि मनुष्य की सारी गतिविधियों का केन्द्रबिन्दु है। वह गति शारीरिक हो, मानसिक हो या हो आध्यात्मिक। यदि नाभि ऊर्जस्वित नहीं होगी और वह ऊर्जा का सम्यक प्रसारण नहीं रखती तो शारीरिक अवयवों में ऊर्जा शक्ति का ह्रास हो जायेगा और शरीर अस्वस्थ हो जायेगा। और इस कारण मन और आत्मा भी अस्वस्थ हो जायेंगे।
योगी पुरुष अपनी नाभि को सूक्ष्म प्राणायाम से ऊर्जस्वित करते हैं। नाभि के पूर्ण रूप से ऊर्जस्वित होने के बाद ही साधक हृदय केन्द्र की ओर बढते हैं। प्राणायाम द्वारा प्राण की और ध्यान द्वारा मन की होती है साधना। ध्यान जब अपनी चरम सीमा पर पहुँच कर समाधि में परिवर्तित हो जाता है तो उसे परमावस्था कहते हैं और उस अवस्था में योगी की स्थिति मस्तिष्क में जिस स्थान पर होती है - वह है सोमचक्र। यदि अचानक हृदय काम करना बन्द कर दे तब भी बीस से तीस मिनट तक नाभि केन्द्र सक्रिय रहता है। इस अवधि में किसी उपचार द्वारा हृदय को पुनः सक्रिय किया जा सकता है।



Mritaatmaao Se Sampark
Title Mritaatmaao Se Sampark
(Contacting the Souls)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 1999
Price Rs. 200.00 (free shipping within india)
ISBN 8171242294
Binding Type Hard Bound
Pages viii + 220 Pages
Size 22.0 cm x 14.0 cm
  buying instruction
मृत्यु एक मंगलकारी क्षण है और एक आनन्दमय अनुभव है। मगर हम अपने संस्कार, वासना, लोभ आदि के कारण उसे दारुण और कष्टमय बना देते हैं। इन्हीं सबका संस्कार हमारी आत्मा पर पड़ा रहता है, जिससे हम मृत्यु के अज्ञात भय से हमेशा त्रस्त रहते हैं।

मृत्यु के समय एक नीरव विस्फोट के साथ स्थूल शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरु हो जाता है और शरीर को जला देने या जमीन में गाड़ देने के बाद भी ये परमाणु वातावरण में बिखरे रहते हैं। परन्तु इनमें फिर से उसी आकृति में एकत्र होने की तीव्र प्रवृत्ति रहती है। साथ ही इनमें मनुष्य की अतृप्त भोग-वासनाओं की लालसा भी बनी रहती है। इसी को प्रेतात्मा कहते हैं। प्रेतात्मा का शरीर वासनामय आकाशीय होता है। मृत्यु के बाद और प्रेतात्मा के पूर्व की अवस्था को 'मृतात्मा' कहते हैं। मृतात्मा और प्रेतात्मा में बस थोड़ा सा ही अन्तर है। वासना और कामना अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की होती हैं। स्थूल शरीर को छोड़कर जितने भी शरीर हैं - सब भोग शरीर हैं। मृतात्माओं के भी भोग शरीर हैं। वे अपनी वासनाओं-कामनाओं की पूर्ति के लिये जीवित व्यक्तियों का सहारा लेती हैं। मगर उन्हीं व्यक्तियों का, जिनका मन दुर्बल है अथवा जिनके विचार, भाव, संस्कार और वासनायें उनसे मिलती-जुलती हैं।

मृतात्माओं का शरीर आकाशीय होने के कारण उनकी गति प्रकाश की गति के समान होती है। वे एक क्षण में हज़ारों मील की दूरी तय कर लेती हैं। अपने आकर्षण केन्द्र की ओर वे तुरन्त दौड़ पड़ती हैं।



Vakreshwar Kee Bhairavi
Title Vakreshwar Kee Bhairavi
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2006
Price Rs. 200.00 (free shipping within india)
ISBN 8171244912
Binding Type Hard Bound
Pages viii + 204 Pages
Size 22.5 cm x 14.5 cm
  buying instruction
उस समय सेवड़ासिंघा अपने महल की छत पर ध्यानस्थ बैठा हुआ था। उसको क्या पता था कि उसकी मृत्यु सामने आ रही है। उसने अपनी ओर आते हुए विशाल शिलाखण्ड की सनसनाती हुई आवाज सुनी तो आँखें खोल कर देखा। वह पल भर में समझ गया कि मृत्यु सिर पर आ चुकी है। अपनी तन्त्रविद्या से उस विशाल शिलाखण्ड को रोकने का प्रयास भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। हवा में चक्कर काटता हुआ शिलाखण्ड आया और तीव्र गति से गिर पड़ा सेवड़ासिंघा के ऊपर। उसके मुँह से एक दर्दनाक चीख निकली। मरते-मरते शाप दिया उसने - रानी रत्नावली, तुमने छल से मारा है मुझे। मैं अपनी तन्त्र साधना का उपयोग करते हुए शाप देता हूँ कि तुम्हारा यह नगर कल का प्रातःकाल न देख सकेगा। कोई प्राणी नहीं बचेगा इस नगर का। कल के बाद इस नगर में कभी कोई नहीं रह सकेगा।


Tibet Kee Veh Rahasyamayee Ghaati
Title Tibet Kee Veh Rahasyamayee Ghaati
(The Mysterious Valley of Tibet)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 1999
Price Rs. 200.00 (free shipping within india)
ISBN 8171242308
Binding Type Hard Bound
Pages viii + 192 Pages
Size 22.0 cm x 14.0 cm
  buying instruction
बड़ी तन्मयता और बड़े ध्यान से लामा युत्सुंग मेरी बात सुनते रहे। सब कुछ सुनने के बाद उनकी मुख-मुद्रा गम्भीर हो गयी। काफी देर तक न जाने क्या सोचते रहे वह आँखे मूँदकर फिर सहज स्वर मे बोले, निश्चय ही आप किसी अलौकिक शक्ति की प्रेरणा के वशीभूत होकर संग्रीला घाटी पहुँच गये थे।

संग्रीला घाटी.... इसका नाम तो मैं पहली बार सुन रहा हूँ। चौँकते हुए मैंने कहा।

तिब्बत और अरुणाचल की सीमा पर स्थित है संग्रीला घाटी। युत्सुंग बोले, लेकिन व्यापक भू-हीनता और चतुर्थ आयाम से प्रभावित होने के कारण अभी तक अगम्य, अगोचर और रहस्यमयी बनी हुई है। यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे। कौतूहल भरे स्वर में मैंने कहा, आपकी चतुर्थ आयाम और भू-हीनता की बात मेरी समझ मे नहीं आयी। इनसे आपका तात्पर्य क्या है?

युत्सुंग सहज गम्भीर हो गये और फिर उसी मुद्रा में बोले - यह अत्यन्त जटिल विषय है शर्मा जी! चतुर्थ आयाम अथवा भू-हीनता के तथ्यगत सिद्धान्तों की ठीक-ठीक व्याख्या और विवेचन करना सभी के वश की बात नहीं है। पिछले पच्चीस साल से प्रयत्नशील हूँ मैं इस दिशा में। यदि स्वयं मैं संग्रीला घाटी के रहस्यमय प्रदेश में न गया होता तो इन दोनों विषयों पर कदापि व्यापक अनुसन्धान न कर पाता।

युत्सुंग ने बताया कि जिस प्रकार वायुमण्डल में कई स्थान "वायु-शून्य" होते हैं उसी प्रकार धरती पर भी ऐसे कई स्थान हैं जो "भू-हीन" हैं। ऐसे स्थान देश, काल और निमित्त से परे होते हैं। उनमें कोई भी वस्तु या प्राणी अनजाने में चला जाये तो तीन आयाम वाले इस जगत की दृष्टि में उसकी सत्ता अदृश्य अथवा लुप्त हो जाती है। लेकिन वहाँ उसका अस्तित्व बना रहता है। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में कब उसका अस्तित्व इस जगत में प्रकट होगा या होगा भी के नहीं।

सबसे आश्चर्यजनक बात तो ये है कि वहाँ काल का प्रभाव नगण्य है और वहाँ मन, प्राण और विचार की शक्ति एक विशेष सीमा तक बढ जाती है।



Vehe Rahasyamaya Kaapalik Math
Title Vehe Rahasyamaya Kaapalik Math
(The Mysterious Kapalik Shrine)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 1999
Price Rs. 225.00 (free shipping within india)
ISBN 8171242227
Binding Type Hard Bound
Pages viii + 204 Pages
Size 22.5 cm x 14.0 cm
  buying instruction
तीसरे चित्र को देखते ही आश्चर्य के मारे मैं स्तब्ध रह गया। हे भगवान्! क्या देख रहा था उस चित्र में मैं। उसका कागज़ भी जीर्ण था। रंग भी फ़ीका था पर वह चित्र अभी एक माह पहले के प्रसंग का और मेरा ही चित्र था वह। अमावस की रात को बाहर खड़ा मैं अन्दर का दृश्य देख रहा था। उसी प्रसंग का चित्र था। अमावस की रात थी। गहरा अन्धकार था। कापालिक मठ की उस रहस्यमय खिड़की से छनकर रोशनी मुझ पर पड़ रही थी। मैं अपने हाथ में पत्थर का टुकड़ा लिये हुए था। मेरे चेहरे पर भय और विस्मय के भाव थे। आँखें विस्फारित थी। होंठ चीखने की मुद्रा में खुले हुए थे। उस वक्त का एकदम सही चित्र था। कहीं कोई भ्रम नहीं था, अविश्वाश भी नहीं किया जा

सकता था।

मैंने अस्फुट स्वर में कहा - "यह चित्र तो मेरा अपना ही है। एक मास पूर्व का, पर यह कैसे सम्भव कैसे हुआ?"

"सम्भव होना आसान है। मेरे पितामह के परदादा श्री वेणी माधव तामणे ने आपको इसी रूप में देखा होगा।"

"क्या कहा!"

उत्तर में समझाते हुए तामणे महाशय ने बतलाया - "जिस व्यक्ति ने कमरे के भीतर से आपको घूर कर देखा था, वे वेणी माधव जी ही थे। उनके साथ जो लोग हवनकुण्ड के पास बैठे थे वे लोग उनके सहयोगी थे। बाद में आपने एक और व्यक्ति को देखा होगा कापालिक सन्यासी के भेष में।"

"हाँ देखा था। कौन था वह जटाजूटधारी भयानक सन्यासी?"

"वही थे वेणी माधव जी के कापालिक गुरु स्वामी प्रज्ञानन्द।"

"एक बात मैं और पूछ सकता हूँ?"

"पूछिये।"

"उस यज्ञ-भूमि में वह नग्न युवती कौन थी?"

मेरी बात सुन कर कुछ क्षण के लिये तामणे महाशय मौन साध गये, फ़िर बोले - "वह कापालिनी थी। भयंकर कापालिनी। उसी का आश्रय लेकर, उसी के माध्यम से स्वामी प्रज्ञानन्द ने रसायनविद्या में सिद्धि-लाभ किया था।" थोड़ा रुक कर तामणे महाशय ने आगे कहना शुरु किया - "आपने चार सौ वर्ष पूर्व का दृश्य देखा था, मगर इस समय कापलिनी की आयु कम से कम पाँच सौ वर्ष है। वह मर कर भी जीवित है। उसकी आयु अक्षुण्ण है। कालञ्जयी है वह कापालिनी। उसी की अगोचर सहायता, निर्देशन और मार्गदर्शन में मैं स्वयं पिछले 45 साल से रसायनविद्या और काष्ठ औषधितन्त्र में शोध और अन्वेषण कर रहा हूँ।



Vehe Rahasyamay Sanyasi
Title Vehe Rahasyamay Sanyasi
(The Mysterious Saint)
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2007
Price Rs. 250.00 (free shipping within india)
ISBN 8OTWRKMH
Binding Type Hard Bound
Pages xxxviii + 332 Pages
Size 22.0 cm x 14.0 cm
  buying instruction
गुफा काफी लम्बी चौड़ी थी। प्रवेश करते ही ऐसा लगा जैसे संसार से अलग हो गया है मेरा अस्तित्व और मैं किसी अनजाने अपरिचित स्थान में आ गया हूँ। सोचा गुफा के भीतर अन्धकार होगा, लेकिन वहाँ चारों तरफ एक हल्का-हल्का शुभ्र प्रकाश फैला हुआ था। वह प्रकाश कहाँ से आ रहा था? समझ में नहीं आया। गुफा की दीवारों में छोटे-छोटे छेद थे जिनमें से ताजी बरसाती हवा भीतर आ रही थी। कच्ची जमीन पर खजूर की चटाईयाँ बिछी हुई थीं और उनके ऊपर कम्बल। एक और मिट्टी के बर्तन थे और एक गगरी थी जिसमें पानी भरा हुआ था। इनके अलावा और कुछ नहीं। बैठ गया मैं कम्बल पर। बड़ा सुख मिला। रत्नकल्प बोले - बाबा! आप भूखे प्यासे होंगे काफी थके हारे भी होंगे। कहिये क्या करूँ आपके लिये बाबा?

यह सुन कर मन ही मन सोचने लगा - मेरे लिये इस बीहड़ निर्जन प्रान्त में क्या करेगा बेचारा यह सन्यासी। शायद मेरे मन की बात समझ गया रत्नकल्प। मेरी ओर देखकर एक बार मुस्कुराया ओर उसकी रहस्यमयी मुस्कराहट के साथ ही घुप अन्धेरा छा गया एकबारगी गुफा में। हे भगवान्! यह क्या? कुछ बोलने ही वाला था कि तभी पहले जैसे शुभ्र प्रकाश से भर उठी पूरी गुफा। मैंने सिर घुमा कर चारों ओर देखा। गुफा का वातावरण बदल चुका था। जमीन पर सुन्दर कालीन, शानदार पलंग, चमचमाते बर्तन, आवश्यक वस्त्र, दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएँ और थालियों में सजे ताजे फल और गरम गरम भोजन। अवाक् और स्तब्ध रह गया मैं - यह सब कुछ देखकर।


Yog Tantrik Saadahana Prasang
Title Yog Tantrik Saadahana Prasang
Author Shri Arun Kumar Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2011
Price Rs. 250.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679671
Binding Type Hard Bound
Pages xxxxviii + 332 Pages
Size 22 cm x 15 cm
  buying instruction
अन्तरंग साधना भूमि में छः प्रकार का दीक्षा क्रम है जिनमें प्रमुख है शक्तिपात दीक्षा। इसी दीक्षा को प्राप्त कर साधक अन्तरंग भूमि में प्रवेश करता है। शक्तिपात दीक्षा तान्त्रिक साधना की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दीक्षा है। साधक के बहिरंग साधना में पूर्ण पारंगत होने के पूर्व संस्कार के अनुसार यथासमय सदगुरु स्वयं उपस्थित होकर यह दीक्षा प्रदान करते हैं। दीक्षा के पूर्व सदगुरु शिष्य के स्थूल शरीर को विशेष तान्त्रिक क्रिया द्वारा भाव शरीर और शूक्ष्म शरीर से पृथक करते हैं और दोनों के साथ अपने भाव और् शूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। तदनंतर क्रम से दोनों का उल्लंघन कर मनोमय शरीर से तादात्म्य स्थापित करते हैं और उसी में शक्तिपात दीक्षा प्रदान करते हैं। तन्त्र की बहिरंग साधना दीक्षा गृहण करने के पश्चात मनोमय शरीर से शुरु होकर निर्वाण शरीर में जाकर समाप्त होती है। तात्पर्य यह है कि अन्तरंग साधना साधना क्रम से चार शरीरों के माध्यम से सम्पन्न होती है। साधना काल में स्थूल की तरह सूक्ष्म शरीर भी निष्क्रिय रहता है, सक्रिय रहता है केवल मनोमय शरीर। इसी शरीर द्वारा तन्त्र की सर्वोच्च और गुह्य साधना, बिन्दु साधना भी सम्पन्न होती है।


Parlok Ke Khulate Rahasya
Title Parlok Ke Khulate Rahasya
Author Shri Arun Kumar Sharma
Compilation Shri Manoj Sharma
Language Hindi
Publication Year: First Edition - 2012
Price Rs. 300.00 (free shipping within india)
ISBN 9788190679688
Binding Type Hard Bound
Pages iv + 75 + 332 Pages
Size 22 cm x 14 cm
  buying instruction
बाबा ने सिर पर ढके कम्बल पर हाथ रखा। एक पल में ऐसा लगा जैसे मैं चेतना शून्य हो गया। कुछ देर बाद ऐसा लगा जैसे बाबा ने मेरे सिर सिर के ऊपर से हाथ हटा दिया। चारों ओर कोलाहल की आवाज आ रही थी। मैंने जब अपने ऊपर से कम्बल हटाया तो देखा कि मैं हरिद्वार के घाट की सीढी पर बैठा हूँ और मृगचर्म भी था। आज भी वह मृगचर्म मेरे मन्दिर में सुरक्षित है। उसी पर बैठ कर आज भी साधना करता हूँ। आज अस्सी की उम्र पार कर रहा हूँ लेकिन वह घटना आज भी मेरे मानसपटल पर अंकित है। ऐसी कौन सी विद्या अथवा शक्ति थी कि जिस पहाड़ी में पहुँचने तक मुझे सात दिन लगे थे उसी पहाड़ी से पल भर में जिस स्थान से चला था वहीं आ गया....।



प्राणतत्त्व अति महत्वपूर्ण है। इसकी सत्ता स्वतन्त्र है।शरीर पाँच तत्त्वों से निर्मित है। प्राणतत्त्व के माध्यम से आत्मतत्त्व से उनका सम्बन्ध बनता है और शरीर हो जाता है चैतन्य जिसे हम जीवन कहते हैं। पंचतत्त्वों का क्रमशः क्षय होता है। पंचतत्त्व निर्मित शरीर का क्षय होता है, परिवर्तन नहीं। लेकिन प्राणतत्त्व के बीच से हटते ही आत्मतत्त्व अलग हो जाता है शरीर से। इसी का नाम मृत्यु है।
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